प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्तियों से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ये नियुक्तियाँ केवल उन विशेष परिस्थितियों में की जानी चाहिए जहाँ मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता की सख्त आवश्यकता हो। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि ऐसी नियुक्तियों के लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन अनिवार्य है। इस टिप्पणी के साथ, शीर्ष अदालत ने अनुकंपा नियुक्ति की कुछ याचिकाओं को खारिज करने से इनकार कर दिया है, जिससे इस संवेदनशील विषय पर कानूनी स्पष्टता आई है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी भट्ट की एकल पीठ द्वारा एक याचिका पर दिया गया। इस मामले में हाथरस के एक निवासी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग की थी। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य अचानक हुई मृत्यु के कारण परिवार को हुई आर्थिक कठिनाई से उबरने में मदद करना है, न कि मृतक के स्थान पर नौकरी का स्थायी अधिकार प्रदान करना। यह निर्णय उन सभी सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है जो अनुकंपा नियुक्तियों को विनियमित करते हैं।

अनुशासन और प्रक्रिया का महत्व
अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि अनुकंपा नियुक्तियों को दया के आधार पर दिए जाने वाले ‘विशेष लाभ’ के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सेवा में प्रवेश के लिए एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में। इसलिए, इन नियुक्तियों के लिए बनाई गई नीतियों और दिशानिर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाना अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो, और केवल वास्तविक पात्र व्यक्तियों को ही इसका लाभ मिल सके।
हाथरस मामले में उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप
एक अन्य संबंधित मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाथरस के एक व्यक्ति की याचिका पर हस्तक्षेप किया, जिसे अक्टूबर 2000 में अनुकंपा के आधार पर सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। इस व्यक्ति की मार्च 2021 को इस आधार पर बर्खास्तगी कर दी गई थी कि उसने रेलवे में अपनी पिछली सेवा और निष्कासन को छिपाया था। बाद में, उसकी नियुक्ति संबंधी समस्या समाप्त होने के बाद अपीलीय प्राधिकारी ने 18 सितंबर 2022 को उसकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा। इस आदेश को याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। यह मामला दर्शाता है कि अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने के बाद भी, यदि किसी व्यक्ति द्वारा धोखाधड़ी या गलत जानकारी दी जाती है, तो कानूनी कार्रवाई संभव है। यह निर्णय सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी और पारदर्शिता के महत्व पर जोर देता है।
सेतु निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक को भुगतान के लिए तलब
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बलिया में सेतु निर्माण निगम के एक पूरे हुए कार्य के संबंध में ठेकेदार के भुगतान के मामले को गंभीरता से लिया है। न्यायालय ने निगम के प्रबंध निदेशक को 30 जुलाई तक स्पष्टीकरण के साथ हाजिर होने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिदंम सिन्हा और न्यायमूर्ति डॉ. वाईके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मेसर्स ओम साईं कंस्ट्रक्शन एंड सप्लायर सल्लाहबाद सलेमपुर की याचिका पर दिया है। यह मामला सरकारी परियोजनाओं में ठेकेदारों के भुगतान में देरी के मुद्दे को उजागर करता है, जो अक्सर परियोजनाओं के समय पर पूरा होने में बाधा डालता है और ठेकेदारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। न्यायालय का यह हस्तक्षेप सरकारी विभागों को उनके वित्तीय दायित्वों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
डूंगरपुर मामले में आजम खान की याचिका पर सुनवाई 31 जुलाई तक स्थगित
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद उच्च न्यायालय में समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की डूंगरपुर मामले में दाखिल आपराधिक याचिका पर अब 31 जुलाई को सुनवाई होगी। इस मामले में दावेदार सरत अली ने भी आपराधिक अपील दाखिल की है। दोनों की अपीलों पर उच्च न्यायालय में एक साथ सुनवाई चल रही है। न्यायमूर्ति समीर जैन की एकल पीठ मामले में सुनवाई कर रही है। रामपुर एमपी-एमएलए कोर्ट ने 10 मई 2024 को आजम खान को इस मामले में 10 साल की सजा सुनाई थी। यह मामला राजनीतिक व्यक्तियों से जुड़े कानूनी विवादों की जटिलता को दर्शाता है और न्यायिक प्रक्रिया में समय लगने की प्रवृत्ति को भी उजागर करता है।
अब्बास अंसारी की हिस्ट्रीशीट पर पुनर्विचार करें गाजीपुर के एसपी
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पूर्व विधायक अब्बास अंसारी की हिस्ट्रीशीट खोले जाने को चुनौती देने वाली याचिका निस्तारित कर दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि गाजीपुर के एसपी इस मामले में अपने महीने के भीतर पुनर्विचार करें और नया आदेश पारित करें। यह निर्णय पुलिस प्रशासन के आंतरिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को दर्शाता है। हिस्ट्रीशीट किसी व्यक्ति के आपराधिक रिकॉर्ड और गतिविधियों का एक दस्तावेज होता है, और इसका खोला जाना या बंद किया जाना पुलिस की विवेकाधीन शक्ति के अंतर्गत आता है। हालांकि, न्यायालय ने इस मामले में पुनर्विचार का निर्देश देकर यह सुनिश्चित किया है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे। यह न्यायिक प्रक्रिया की उस भूमिका को भी दर्शाता है जिसमें वह यह सुनिश्चित करती है कि प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग न हो।
निष्कर्ष: न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही
उपरोक्त सभी न्यायिक निर्णय भारतीय कानूनी प्रणाली की गतिशीलता और उसके विभिन्न आयामों को दर्शाते हैं। चाहे वह अनुकंपा नियुक्तियों में नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना हो, सरकारी भुगतान में पारदर्शिता लाना हो, या राजनीतिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना हो, अदालतें लगातार न्याय और जवाबदेही की दिशा में काम कर रही हैं। इन निर्णयों का उद्देश्य न केवल व्यक्तिगत न्याय सुनिश्चित करना है, बल्कि सार्वजनिक प्रशासन में भी सुधार लाना है और नागरिकों के विश्वास को बढ़ाना है। इन सभी मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता और उसमें लगने वाला समय भी स्पष्ट होता है, जो कानून के शासन के महत्व को रेखांकित करता है।
