आज के दौर में बच्चों का मोबाइल की ओर बढ़ता झुकाव एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। पढ़ाई से ध्यान भटकना, माता-पिता की बातों से चिढ़ जाना और सामाजिक व्यवहार में कमी जैसी समस्याएं मोबाइल के अत्यधिक उपयोग का सीधा परिणाम हैं। ऐसे में अभिभावकों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों के लिए टेक्नोलॉजी का सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करें। एक समाधान के रूप में, आयु-आधारित लॉक सिस्टम या पैरेंटल कंट्रोल की अवधारणा सामने आई है, जो बच्चों को उनके उम्र के अनुसार उपयुक्त सामग्री तक ही सीमित कर सकती है।
तकनीक का सही दिशा में उपयोग
अक्सर देखा गया है कि माता-पिता बच्चों के नाम से ईमेल आईडी बनाकर उन्हें स्मार्टफोन या टैबलेट थमा देते हैं। कई बार यह सुविधा बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित होती है, क्योंकि वे अनजाने में ऐसे एप्लिकेशन या वेबसाइट तक पहुँच सकते हैं जो उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।
लेकिन अब स्थिति को सुधारने की दिशा में तकनीकी कंपनियों ने पहल शुरू कर दी है। नए मोबाइल फोन और ऑपरेटिंग सिस्टम में ऐसे विकल्प जोड़े जा रहे हैं, जिससे जब बच्चों के लिए खाता बनाया जाए, तो उसमें उनकी उम्र के अनुसार कंटेंट स्वतः ही फिल्टर हो जाता है। इससे उन्हें केवल वही ऐप्स और वेबसाइट्स दिखाई देती हैं जो उनके लिए उपयुक्त होती हैं।

वास्तविक जीवन से जुड़े मामले
केस – 1:
एक माता-पिता अपने नौ वर्षीय बेटे को लेकर मनोचिकित्सक के पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि बच्चा घंटों मोबाइल पर व्यस्त रहता है और उसके व्यवहार में बदलाव दिखने लगे हैं। जांच में पाया गया कि उसका ईमेल आईडी वयस्कों के रूप में रजिस्टर किया गया था, जिससे उसे गेम्स और अन्य असंगत कंटेंट तक भी पहुँच मिल रही थी। डॉक्टर ने सलाह दी कि अगली बार जब नया खाता बनाया जाए, तो बच्चे की वास्तविक उम्र भरें, ताकि सिस्टम स्वतः ही उसे सुरक्षित सीमा में रखे।
केस – 2:
एक अन्य व्यक्ति, जो नानी के घर पर अपने बच्चे को छोड़कर काम पर जाते थे, ने बताया कि सात साल की उम्र का उनका बेटा मोबाइल में अशोभनीय वीडियो देखने लगा था। मनोचिकित्सक द्वारा जांच में सामने आया कि बच्चे के पास जो मोबाइल था, उसमें कोई भी कंट्रोल सेटिंग नहीं थी। परिणामस्वरूप, वह खुले इंटरनेट की दुनिया में बिना किसी रोक-टोक के घूम रहा था। ऐसे मामलों में पैरेंटल लॉक बेहद आवश्यक साबित हो सकता है।
अभिभावकों के लिए उपयोगी उपाय
मोटीलाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय के मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान के अनुसार, आज के समय में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उन्हें सुरक्षित टेक्नोलॉजी वातावरण देना संभव है। उन्होंने बताया कि जब भी माता-पिता मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप खरीदते हैं, तो खाता बनाते समय वास्तविक जन्मतिथि दर्ज करें और बच्चों के लिए ‘किड मोड’ या ‘पैरेंटल कंट्रोल’ फीचर का उपयोग करें।
साथ ही, अभिभावक बच्चों के स्क्रीन टाइम की निगरानी रखें और समय-समय पर उनके डिजिटल व्यवहार की समीक्षा करें। अगर बच्चा किसी चीज़ को लेकर बार-बार चिढ़ता है या आक्रामक व्यवहार दिखाता है, तो उसे अनदेखा न करें और मनोचिकित्सक से सलाह अवश्य लें।
निष्कर्ष
बच्चों को तकनीक से पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है, लेकिन उन्हें सुरक्षित तकनीक देना हर माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। आयु-आधारित लॉक सिस्टम, पैरेंटल कंट्रोल और सतर्कता के जरिए हम बच्चों को मोबाइल की लत से बचा सकते हैं। समय रहते उठाया गया यह कदम उनके मानसिक और शारीरिक विकास को सही दिशा देने में सहायक साबित होगा।
