प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों से शिक्षक बने याचिकाकर्ताओं की पुरानी पेंशन की मांग पर राज्य सरकार के बेसिक शिक्षा विभाग को सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा है कि यदि चार सप्ताह के भीतर सचिव इस विषय पर फैसला नहीं लेते हैं, तो उन्हें स्वयं अदालत में पेश होना होगा।
मामला क्या है?
प्रदेश में वर्ष 2000 में “शिक्षामित्र योजना” की शुरुआत की गई थी, जिसके अंतर्गत सहायक के रूप में शिक्षामित्रों की नियुक्ति की गई थी। वर्षों तक सेवा देने के बाद, इन्हें सहायक अध्यापक के रूप में समायोजित कर दिया गया। समस्या तब उत्पन्न हुई जब कई शिक्षामित्रों की नियुक्ति 2005 से पूर्व हुई थी, लेकिन समायोजन बाद में होने के कारण उन्हें पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं दिया गया।

कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह मामला लंबे समय से लंबित है और विभाग की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सभी शिक्षकों को पुरानी पेंशन का लाभ मिलना चाहिए जिनकी प्रारंभिक नियुक्ति 2005 से पहले हुई थी।
वेतन मामलों में भी नाराज़गी
हाईकोर्ट ने वेतन संबंधी मामलों में देरी पर भी कड़ी नाराज़गी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि वेतन और सेवा शर्तों से संबंधित मामलों में गठित समिति की कार्यप्रणाली में टालमटोल की प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगे। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर इस प्रकार की देरी न केवल कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करती है, बल्कि यह न्यायिक व्यवस्था का भी अनादर है।
याचिकाकर्ता की बात
मुख्य याचिकाकर्ता संत नगर निवासी श्री नीरेश प्रसाद ने कोर्ट को बताया कि उन्हें 2001 में शिक्षामित्र के तौर पर नियुक्त किया गया था और बाद में सहायक अध्यापक पद पर समायोजित किया गया। लेकिन अभी तक उन्हें पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं मिला है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए सचिव को सख्त निर्देश दिए हैं।
आगे क्या?
हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव से अपेक्षा की है कि वे 4 सप्ताह के भीतर इस मामले में फैसला लें। यदि ऐसा नहीं होता है, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
निष्कर्ष
इस फैसले से राज्य भर के उन हजारों शिक्षकों को राहत मिलने की संभावना है, जो वर्षों से अपनी पेंशन को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। यह न केवल शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करेगा बल्कि सरकार की जिम्मेदारी और पारदर्शिता को भी स्पष्ट करेगा। ऐसे मामलों में देरी केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है, जिसे अब अदालतों ने गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है।
